Andhra Pradesh High Court ने एक महत्वपूर्ण income tax case law में फैसला देते हुए स्पष्ट किया कि यदि Assessing Officer अपने assessment order में Section 269SS के उल्लंघन के संबंध में कोई स्पष्ट संतुष्टि दर्ज नहीं करता, तो बाद में Section 271D penalty लगाना कानूनन उचित नहीं माना जाएगा। यह मामला Grandhi Sri Venkata Amarendra Vs JCIT से संबंधित है जिसमें आयकर विभाग ने लगभग ₹1.50 करोड़ का cash loan penalty लगाया था। मामला उस समय सामने आया जब Section 132 search and seizure कार्रवाई के दौरान M/s Usha Bala Group और V.V. Balakrishna Rao के मामलों की जांच में याचिकाकर्ता से संबंधित कुछ दस्तावेज प्राप्त हुए। इसके बाद विभाग ने Section 153C proceedings शुरू करते हुए करदाता से आयकर रिटर्न दाखिल करने को कहा। करदाता ने 15 अप्रैल 2022 को अपना रिटर्न दाखिल करते हुए ₹24,13,920 की कुल आय घोषित की। आकलन की कार्यवाही Section 143(3) के तहत शुरू हुई और कथित नकद ऋण लेन-देन के संबंध में नोटिस जारी किए गए। करदाता ने अपने उत्तर में स्पष्ट किया कि उसने कोई cash loan स्वीकार नहीं किया है और सभी लेन-देन केवल banking channels के माध्यम से किए गए थे। इसके बावजूद विभाग ने 02 जून 2014 के एक पत्र तथा 17 वित्तीय लेन-देन का हवाला देते हुए यह निष्कर्ष निकाला कि करदाता ने लगभग ₹1.50 करोड़ का ऋण नकद रूप में लिया था और इस आधार पर Section 69A के तहत जोड़ किया गया।
मामले को आगे Joint Commissioner of Income Tax के पास भेजा गया, जिन्होंने Section 271D के तहत दंडात्मक कार्यवाही शुरू कर दी। याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट में याचिका दायर करते हुए यह तर्क दिया कि assessment order में कहीं भी यह दर्ज नहीं किया गया कि करदाता ने Section 269SS violation किया है या कि नकद ऋण लेने के कारण penalty proceedings शुरू की जानी चाहिए। अदालत ने रिकॉर्ड का गहन परीक्षण करते हुए पाया कि Assessing Officer ने केवल एक पत्र और कुछ दस्तावेजों के आधार पर निष्कर्ष निकाला लेकिन यह स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं किया कि वास्तव में cash transaction हुआ था या नहीं। न्यायालय ने यह भी कहा कि जब तक आकलन अधिकारी स्वयं आकलन के दौरान यह संतुष्टि दर्ज नहीं करता कि Section 269SS का उल्लंघन हुआ है, तब तक Joint Commissioner को Section 271D penalty लगाने का अधिकार नहीं मिलता। सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण निर्णय CIT vs Jai Laxmi Rice Mills का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि दंडात्मक कार्यवाही प्रारंभ करने से पहले स्पष्ट संतुष्टि दर्ज करना अनिवार्य है। चूंकि इस मामले में ऐसी संतुष्टि दर्ज नहीं की गई थी, इसलिए अदालत ने 23 नवंबर 2023 को जारी जुर्माना आदेश को रद्द करते हुए करदाता की याचिका स्वीकार कर ली। यह निर्णय income tax litigation, cash loan tax penalty और section 271d case law से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण न्यायिक मिसाल माना जा रहा है।